महिलाओं को लेकर देवबंदी उलेमाओं ने जताई चिंता, बोले- तलाक़शुदा और विधवा महिलाओं के प्रति समाज का रवैया शर्मनाक

Ulema on Dhirendra Shastri

सहारनपुर : देवबंदी उलेमाओं ने महिलाओं के सम्मान और उनके प्रति समाज में व्याप्त रवैये पर गहरी चिंता व्यक्त की है। उन्होंने कहा कि विशेष रूप से तलाक़शुदा और बेवा महिलाओं के साथ समाज का व्यवहार न केवल असंवेदनशील है, बल्कि यह नैतिकता और मानवीय मूल्यों के भी विरुद्ध है। जमीयत दावतुल मुस्लिमीन के संरक्षक एवं प्रसिद्ध मौलाना क़ारी इसहाक़ गोरा ने कहा कि महिलाओं के सम्मान के सवाल पर हमारा समाज आज भी अपेक्षित गंभीरता नहीं दिखा पा रहा है।

उन्होंने अफ़सोस जताते हुए कहा कि जिन महिलाओं को सहारे, अपनत्व और इज़्ज़त की सबसे अधिक ज़रूरत होती है, उन्हें शक, तानों और सवालों के कटघरे में खड़ा कर दिया जाता है। तलाक़ या बेवगी किसी महिला का दोष नहीं, बल्कि जीवन की एक कठिन और पीड़ादायक परीक्षा है। इसके बावजूद समाज ऐसे हालात से गुज़र रही महिलाओं को रहमत और हमदर्दी की नज़र से देखने के बजाय, उनके चरित्र और नीयत पर सवाल उठाने लगता है। मौलाना के अनुसार यह सोच न केवल ग़लत है, बल्कि समाज को अंदर से कमज़ोर और खोखला करने वाली भी है।

मौलाना क़ारी इसहाक़ गोरा ने आगे कहा कि इस्लामी शिक्षाएँ महिलाओं को सम्मान, सुरक्षा और आत्मसम्मान के साथ जीवन जीने का पूरा अधिकार देती हैं। उन्होंने याद दिलाया कि इस्लाम ने तलाक़शुदा और बेवा महिलाओं को नए सिरे से जीवन शुरू करने का हक़ दिया है और समाज को उनके साथ इंसाफ़ और इज़्ज़त का व्यवहार करने की शिक्षा दी है। उन्होंने कहा कि दुर्भाग्यवश आज हम धार्मिक शिक्षाओं की रूह को नज़रअंदाज़ कर केवल सामाजिक रूढ़ियों और ग़लत परंपराओं के पीछे चल पड़े हैं। इसका परिणाम यह होता है कि पीड़ित महिला को ही दोषी ठहरा दिया जाता है, जबकि उसे सबसे अधिक सहारे, भरोसे और सम्मान की आवश्यकता होती है।

मौलाना ने समाज के सभी वर्गों से आत्ममंथन करने की अपील की। उन्होंने कहा कि यदि हम वास्तव में एक सभ्य, नैतिक और स्वस्थ समाज का निर्माण चाहते हैं, तो महिलाओं के प्रति अपने रवैये में ईमानदार और व्यवहारिक बदलाव लाना होगा। केवल भाषणों और नारों से नहीं, बल्कि अपने आचरण से यह साबित करना होगा। अंत में मौलाना क़ारी इसहाक़ गोरा ने कहा कि महिलाओं की इज़्ज़त किसी पर एहसान नहीं, बल्कि उनका बुनियादी और नैसर्गिक अधिकार है। तलाक़शुदा और बेवा महिलाओं को इल्ज़ाम नहीं, बल्कि सम्मान, सहारा और नई शुरुआत का अवसर मिलना चाहिए। यही इंसानियत है, यही धर्म की सच्ची तालीम और यही एक स्वस्थ समाज की पहचान है

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